ALL उत्तरप्रदेश विदेश राष्ट्रीय शिक्षा खेल धर्म-अध्यात्म मनोरंजन संपादकीय epaper
कौशिल्या को अभी भी न्याय की आश
December 3, 2019 • Tariq • उत्तरप्रदेश

 

कौशिल्या को अभी भी न्याय की आश

रायबरेली ब्यूरों 
रायबरेली। लम्बी लड़ाई लड़ने के बाद विधिक रूप से अयोध्या में रामलला तो विराजमान हो रहे हैं, किन्तु रायबरेली जनपद के महराजगंज की 80 वर्षीय वृद्ध कौशिल्या देवी अपने पति के हत्यारे जगदीप कुमार को सजा दिलाने के लिए 17 वर्ष से दर-दर की ठोकरे खा रही हैं।  उल्लेखनीय है कि महराजगंज स्थित प्रसिद्ध रामजानकी मन्दिर की स्थापना रामशंकर दयाल ने अपने जीवनकाल में की थी और अपनी हत्या की आशंका अपने सगे भतीजे जगदीप कुमार द्वारा किये जाने हेतु जिलाधिकारी रायबरेली, महामहिम राज्यपाल उ0प्र0 सहित अन्य अधिकारियों से की थी।  प्रकरण में 17 वर्ष बाद एफ.आई.आर. थाना महराजगंज में पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) ओ.पी. यादव के प्रयास से पंजीकृत तो हुई, किन्तु दो वर्ष हो रहे हैं, विवेचना अभी तक नहीं हो पाई है। वर्तमान विवेचनाधिकारी/प्रभारी निरीक्षक महराजगंज जगदीप कुमार को लाभ पहुंचाना चाहते हैं, जिसकी शिकायत भी कौशिल्या देवी ने पुलिस अधीक्षक रायबरेली से दिनांक 18 सितम्बर 2019 को की, किन्तु अभी तक विवेचना स्थानान्तरित नहीं हुई।  मामला मान्नीय उच्च न्यायालय में  विचाराधीन है, अभियुक्त को लाभ मिल जाए इसलिए न्यायालय में पड़ने वाली तिथियों में भी पैरवी हेतु इंस्पेक्टर महराजगंज कभी उपस्थित नहीं होते है।  जगदीप कुमार एक बेहद शातिर किस्म का अपराधी है, जो कि अपने प्रभाव का दुरूप्रयोग करते हुए आन्ध्रा बैंक से रूपये 5,98,00,0000/- (रूपया पांच करोड़ अट्ठानबे लाख) का डिफाल्टर है, अपर जिलाधिकारी राजस्व द्वारा इसकी बन्धकशुदा सम्पत्ति पर भौतिक कब्जा किये जाने का आदेश इंस्पेक्टर महराजगंज एवं उपजिलाधिकारी महराजगंज को दिया है, किन्तु कब्जा करने को कौन कहे, राजस्व विभाग के किसी भी अधिकारी/कर्मचारी ने जगदीप कुमार की बन्धकशुदा सम्पत्ति के आस-पास भटकना उचित नहीं समझा, जबकि इस मामले में किसी भी न्यायालय से कोई स्थगनादेश भी नहीं है।
 दुःख तो इस बात का है कि जिला प्रशासन रायबरेली बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी करता है किन्तु एक 80 वर्षीय वृद्ध महिला के आँसू उसे नहीं दिखाई देते जो अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव पर है, और शायद इसी विश्वास से जिन्दा है कि उसके पति का हत्यारा जेल की सलाखों के पीछे अवश्य होगा।

मनीष श्रीवास्तव रायबरेली सवांददाता