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पेंशन का अधिकार महज एक कार्यकारी या प्रशासनिक आदेश के जरिये नहीं छीना जा सकता
March 4, 2020 • Tariq • राष्ट्रीय

पेंशन का अधिकार महज एक कार्यकारी या प्रशासनिक आदेश के जरिये नहीं छीना जा सकता ।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पेंशन का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत संरक्षित संपत्ति के अधिकार के अंतर्गत कवर किया गया है और इसे केवल एक कार्यकारी आदेश या प्रशासनिक निर्देश द्वारा छीना नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपील में इस मुद्दे पर विचार किया था कि क्या बिहार सरकार द्वारा एक सर्कुलर और सरकारी संकल्प जारी करके अपने कर्मचारियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमे के आधार पर 10 फीसदी पेंशन और पूरी ग्रेच्यूटी रोके जाने को न्यायोचित ठहराया जा सकता है? प्रासंगिक अवधि के दौरान मौजूद बिहार पेंशन नियमावली के नियम 43(बी) के तहत बिहार सरकार को किसी कर्मचारी का पूरा या आंशिक पेंशन स्थायी तौर पर या कुछ खास समय के लिए रोकने अथवा निकासी करने का अधिकार था। यदि पेंशनर को किसी भी 'विभागीय या न्यायिक कार्यवाही के तहत गंभीर कदाचार का दोषी पाया जाता है', अथवा उसके कार्यकाल के दौरान 'कदाचार अथवा लापरवाही के कारण सरकार को आर्थिक नुकसान' पहुंचता है, लेकिन इसके तहत वैसे मामले नहीं आते हैं जिनमें न्यायिक कार्यवाही अथवा विभागीय कार्रवाई लंबित हों। हालांकि राज्य सरकार ने 22.08.1974 और 31.10.1974 को दो सर्कुलर जारी किये थे, साथ ही 31 जुलाई 1980 को सरकारी संकल्प जारी किया था, जिसके तहत एक नया प्रावधान जोड़ा गया था कि सेवानिवृत्ति के दौरान किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय या न्यायिक कार्रवाई चल रही है तो उसे 75 प्रतिशत ही पेंशन दिया जाएगा। सर्कुलर में कहा गया था कि मुकदमा लंबित रहने के दौरान संबंधित कर्मचारी को न तो ग्रेच्युटी मिलेगी, न ही मृत्यु-सह- सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी दी जायेगी। इस अपील में दलील दी गयी थी कि कार्यकारी निर्देश की श्रेणी में आने के कारण सर्कुलर और सरकारी संकल्प का कानूनी महत्व नहीं रह जाता और इसके आधार पर पेंशन पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह (पेंशन) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत संवैधानिक अधिकार है। न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की खंडपीठ ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि सरकार ने प्रशासनिक सर्कुलर के तहत अपीलकर्ता की 10 फीसदी पेंशन रोककर गैर-न्यायोचित कार्य किया है। कोर्ट ने कहा कि 22.08.1974 और 31.10.1974 को जारी सर्कुलर और 31 जुलाई 1980 को जारी सरकारी संकल्प संख्या 3104 महज प्रशासनिक निर्देश/कार्यकारी आदेश थे, क्योंकि इन्हें संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत प्रदत्त अधिकारों के दायरे में जारी नहीं किया गया था और कानून की नजर में इनका कोई महत्व नहीं है। बेंच ने 'देवकीनंदन प्रसाद बनाम बिहार सरकार' मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा, " पेंशन और ग्रेच्युटी महज उपहार नहीं हैं या ये नियोक्ता द्वारा उदारतापूर्वक नहीं दिये जाते हैं। कर्मचारी को ये फायदे उनकी लंबी, निरंतर, भरोसेमंद और बेदाग सेवा के लिए दिया जाता है। एक सरकारी कर्मचारी को मिलने वाला पेंशन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 31(एक) के तहत सम्पत्ति के अधिकार के अंतर्गत संरक्षित है। 20 जून 1979 से प्रभावी संविधान (44वां संशोधन) अधिनियम 1978 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 31(एक) के निरस्त होने के बावजूद पेंशन पाने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत संपत्ति के अधिकार के तहत आता है।" हालांकि इस तथ्य पर ध्यान देते हुए कि बिहार पेंशन नियमावली में नियम 43(सी) को शामिल किया गया था और यह 19 जुलाई 2012 से प्रभावी हुआ था, बेंच ने कहा कि राज्य सरकार को पेंशन राशि में 10 फीसदी कटौती करने का अधिकार दिया गया है, जो आपराधिक मुकदमों के निर्णय पर निर्भर करेगा, लेकिन यह आपराधिक मुकदमे के परिणाम पर निर्भर करेगा। केस का नाम : डॉ. हीरालाल बनाम बिहार सरकार एवं अन्य केस नं. : सिविल अपील संख्या 1677-1678/ 2020 कोरम : न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित और न्यायमूर्ति इंदु।


रिपोर्ट@त्रिलोकी नाथ